"और नब्ज़ डूब गई"
"और नब्ज़ डूब गई"
Umme Fatima
Associate member

हाल ही में पब्लिश हुई किताब बहरे बे करां जोकि अफ़सानों यानी कहानियों का संग्रह है जिसका विमोचन 25 अगस्त सन 2019 में दिल्ली पुलिस पब्लिक लाइब्रेरी ओखला विहार पुलिस स्टेशन में किया गया विमोचन में उर्दू के प्रख्यात कवि जामिया मिल्लिया इस्लामिया उर्दू डिपार्टमेंट के हेड व दिल्ली उर्दू अकैडमी के चेयरमैन प्रोफेसर शहपर रसूल ने अध्यक्षता की और  प्रोफेसर कौसर मज़हरी , डॉक्टर फ़रयाद आज़र  और रख्शंदा रूही जैसे साहित्यकारों ने अपने विचार दिए बहर-ए बे करां  कहानियों का एक ऐसा संग्रह है जिसमें समाज के बीच हो रही घटनाओं  और समाज की समस्याओं पर एक बेहतरीन मंज़र कशी की गई है  बहर-ए-बेकरां  की लेखिका फ़रज़ाना शमशी हैं जिनकी यह पहली किताब है जो पब्लिश हुई है फ़रज़ाना शमशी बताती हैं कि उनकी पैदाइश सन 1991 उत्तर प्रदेश के जिला सिद्धार्थ नगर में हुई शुरुआती पढ़ाई भी वही की रही लेकिन जल्द ही वह अपने परिवार के साथ मुंबई चली गईं जहां उन्होंने स्कूलिंग ग्रेजुएशन पोस्ट ग्रेजुएशन साथी मास कम्युनिकेशन किया

 उसके बाद मुंबई इंक़लाब उर्दू में सब एडिटर के तौर पर काम किया और अब पिछले 4 सालों से वह दिल्ली में रह रही है फ़रज़ाना शमसी शुरू से लिखने पढ़ने में दिलचस्पी लेती थी और लिखने पढ़ने की प्रेरणा उनको उनके स्वर्गीय पिता शमसुद्दीन खान से मिली शमसुद्दीन खान अदब शायरी साहित्य के बड़े क़द्रदान थे यही वजह थी कि उनके पास दुनिया की बेश क़ीमत किताबों का ज़खीरा था फ़रज़ाना शमशी को लिखने पढ़ने मैं काफी मदद उनके पिता से मिलती थी उनके आर्टिकल्स और अफ़साने अख़बारात में  छपते थे जिससे उन्हें काफी सराहना मिलती थी फ़रज़ाना शमसी की यह किताब बहर-ए-बेकरां जो समाज का एक आईना है जिसमें उन्होंने बहुत ही संजीदगी से और बहुत ही महारत से एक मैसेज देने की  कोशिश की है जिसमें आप पाएंगे के समाज की जो समस्याएं हैं  वह समाज ने किस तरह खुद पैदा की हैं

फ़रज़ाना शमसी ने अपने अफसाना "अंजाम" के ज़रिए समाज में फैली दहेज की कुरीति का जो नुकसान है उनको इस तरह से दर्शाया कि अमीर बाप किस तरह से अपनी बेटियों को दहेज देता है जिससे वह बेटियां जो गरीब हैं जिनके पास दहेज देने को कुछ नहीं होता है या तो वह सारी जिंदगी अविवाहित रहकर बिताती हैं या खुदकुशी करती हैं हालांकि वही दहेज के लालची उनकी बेटियों का भी शोषण करते हैं और कहीं जलाकर मारने और कहीं सता कर मारने की घटनाएं होती  हैं दूसरी तरफ उन्होंने अपने अफ़साने "और नब्ज़ डूब गई" में पारिवारिक हिंसा शोषण और कलह को दर्शाया है जिसके कारण बच्चों की मानसिकता पर बहुत ही बुरा असर पड़ता है जिससे वह अपराधिक कार्यों में लिप्त होकर समाज के लिए एक खतरनाक रोग बन जाते हैं  उन्होंने अपने एक अफसाने "दस्तक" में भ्रूण हत्या गर्भपात को समाज के लिए बहुत ही हानिकारक बताते हुए उसका परिणाम दर्शाया है जिसके कारण हंसते खेलते हुए परिवार की खुशी सदा के लिए खत्म हो जाती  हो जाती है। "मयूरी" में वेश्यावृत्ति मानव तस्करी के कारणों और उनके संभावनाओं को उजागर किया है समाज का वह तबक़ा जो खुद को सफेदपोश बताता है वह इस काले,सियाह माहौल को बनाने का कितना ज़िम्मेदार है यह बात इसमें बखूबी पेश की गई है इसी तरह फ़रज़ाना शमसी कि इस किताब बहर-ए- बेकरां में  आप पाएंगे की हर कहानी मैं एक संदेश है आप कहानियों से लुत्फ़ अंदोज़ भी होंगे,आपकी आंखें भी नम होंगीऔर  आप बहुत ग़ौर व फ़िक्र करने पर, सोचने पर मजबूर भी होंगे आपको चाहिए कि आप बहर-ए-बेकरां एक बार ज़रूर पढ़ें।